कामन्दकीय नीतिसार का दशम सर्ग (विग्रहविकल्पप्रकरणम्) भारतीय राजनय-परम्परा में संघर्ष, युद्ध एवं उसके शमन के सूक्ष्म वर्गीकरण, विग्रह के मनोवैज्ञानिक तथा भौतिक कारणों की पहचान, वैर के प्रकार एवं फल-विचार, तथा देश-काल-बल-मित्र-दैव के आधार पर विग्रह-विकल्प के विवेकपूर्ण निर्णय का महत्वपूर्ण स्रोत है। इस सर्ग में कुल ४५ श्लोक हैं।
"अमर्षोपगृहीतानां मन्युसन्तप्तचेतसाम् ।
परस्परापकारेण पुंसां भवति विग्रहः ॥"
- कामन्दकीय नीतिसार (श्लोक १)
| अमर्ष और मन्यु से संतप्त चित्त वाले पुरुषों में परस्पर अपकार से विग्रह उत्पन्न होता है (श्लोक १)। |
प्रस्तावना
भारतीय राजनीति-शास्त्र की परम्परा अत्यन्त प्राचीन, समृद्ध और वैज्ञानिक रही है। वैदिक साहित्य, महाभारत, रामायण, मनुस्मृति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, शुक्राचार्य के शुक्रनीति तथा आचार्य कामन्दक के कामन्दकीय नीतिसार जैसे ग्रन्थों में राज्य-व्यवस्था, शासन-प्रणाली, कूटनीति, विदेश-नीति तथा राजधर्म के सिद्धान्तों का विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। इन ग्रन्थों में कामन्दकीय नीतिसार भारतीय नीतिशास्त्र का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें राज्य की सुरक्षा, राजनय, मित्र-शत्रु नीति, संधि, विग्रह तथा विजय के विविध उपायों का व्यावहारिक एवं दार्शनिक विवेचन किया गया है।
कामन्दकीय नीतिसार का दशम सर्ग विग्रहविकल्पप्रकरणम् संघर्ष, युद्ध एवं उसके शमन अर्थात् शांत करने की नीति का विस्तृत प्रतिपादन करता है। 'विग्रह' का अर्थ है विरोध, संघर्ष, युद्ध या टकराव। 'विकल्प' का अर्थ है विकल्प, प्रकार या निर्णय। 'प्रकरण' का अर्थ है विषय या अध्याय। इस प्रकार यह सर्ग बताता है कि राजा या नीतिज्ञ को कब, क्यों, किसके साथ और कैसे विग्रह करना चाहिए तथा कब उसका शमन करना चाहिए।
कामन्दक विग्रह को अन्तिम उपाय मानते हैं। उससे पहले राजा को साम, दान और भेद जैसे चतुरुपाय के साधनों से, और फिर दान, दम, क्षान्ति, उपेक्षा जैसे शमन-साधनों से प्रयास करना चाहिए। दण्ड अन्तिम विकल्प है। यहाँ 'दान' दोनों सूचियों में आता है—चतुरुपाय में यह शत्रु को तोड़ने का साधन है, शमन-उपायों में यह शत्रु को सन्तुष्ट करने का। प्रस्तुत अध्ययन में विग्रहविकल्पप्रकरणम् के समस्त ४५ श्लोकों का क्रमबद्ध विश्लेषण करते हुए उनके भावार्थ, दार्शनिक पक्ष एवं राजनीतिक महत्त्व का विवेचन किया गया है। साथ ही, इन सिद्धान्तों की आधुनिक अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों, विदेश-नीति, सामरिक कूटनीति तथा शासन-व्यवस्था में प्रासंगिकता का भी परीक्षण किया गया है।
विग्रह की जड़ कहाँ है? (श्लोक १-५)
कामन्दक विग्रह को किसी बाहरी घटना से नहीं, मन की संतप्त अवस्था से जोड़ते हैं। सर्ग का पहला ही श्लोक यह स्पष्ट कर देता है कि जब अमर्ष और मन्यु चित्त पर अधिकार कर लेते हैं, तब बुद्धि का विवेक ढँक जाता है और व्यक्ति परस्पर अपकार की ओर बढ़ता है।
अमर्षोपगृहीतानां मन्युसन्तप्तचेतसाम्।
परस्परापकारेण पुंसां भवति विग्रहः॥ १॥
अमर्ष केवल क्रोध नहीं है। यह परिभव-असहिष्णुता है, वह मानसिक स्थिति जिसमें व्यक्ति दूसरे की अवहेलना या अपमान को सह नहीं पाता। मन्यु क्रोध से भी गहरा शब्द है। इसमें दुःख और आक्रोश दोनों मिले होते हैं। जब ये दोनों भाव चित्त पर छा जाते हैं, तब व्यक्ति पहले सोचता नहीं, प्रतिक्रिया देता है।
कामन्दक का यह निदान आधुनिक मनोविज्ञान के उस निष्कर्ष से मिलता है जिसे 1939 में Dollard और उनके साथियों ने Frustration-Aggression Theory में रखा था। परन्तु कामन्दक का वर्णन उस सिद्धान्त से पहले आता है और अधिक सूक्ष्म है, क्योंकि वे अमर्ष और मन्यु को अलग-अलग पहचानते हैं। अमर्ष में अपमान का बोध है, मन्यु में अन्याय का दुःख। गीता भी इस द्वन्द्व को पहचानती है जब कहती है कि इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व ही मोह को जन्म देता है (गीता ७.२७)।
यह देखकर कि विग्रह मन से जन्म लेता है, कामन्दक यह नहीं कहते कि राजा को कभी विग्रह ही नहीं करना चाहिए। वे दूसरे श्लोक में उसकी शर्तें रखते हैं।
आत्मनोऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण वा।
देशकालबलोपेतः प्रारभेतैव विग्रहम्॥ २॥
तीन शर्तें हैं। राजा को अपनी उन्नति की सच्ची इच्छा हो। वह शत्रु से पीड़ित हो रहा हो। और वह देश, काल तथा बल तीनों से युक्त हो। तीनों में से एक भी शर्त छूटी तो विग्रह विनाशकारी होगा।
कामन्दक ने 'अभ्युदयाकाङ्क्षी' शब्द का प्रयोग सोच-समझकर किया है। वे बदले की भावना से युद्ध की अनुमति नहीं देते। विग्रह का लक्ष्य उन्नति होनी चाहिए, केवल प्रतिशोध नहीं। 1971 में भारत ने पाकिस्तान से युद्ध तब किया जब पूर्वी पाकिस्तान में संकट चरम पर था, मौसम अनुकूल था, और भारत की सेना तैयार थी। तीनों शर्तें पूरी थीं। इसके विपरीत, 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण तब किया जब भारत आर्थिक और सैन्य रूप से कमज़ोर था। कामन्दक की भाषा में कहें तो चीन ने अपनी 'देशकालबल' की शर्तें जाँच ली थीं, भारत ने नहीं जाँची थीं।
विग्रह के कारण क्या हैं, यह तीसरे और चौथे श्लोक में गिनाया गया है।
राज्यस्त्रीस्थानदेशानां ज्ञानस्य च बलस्य च।
अपहारो मदो मानः पीडा वैषयिकी तथा॥ ३॥ज्ञानार्थशक्तिधर्माणां विघातो दैवमेव च।
मित्रार्थं चावमानश्च तथा बन्धुविनाशनम्॥ ४॥
'अपहार' और 'विघात' — इन दो शब्दों के बीच का अन्तर समझना ज़रूरी है। अपहार बाहरी हरण है, जैसे राज्य, स्त्री, स्थान, देश, ज्ञान या बल का छिन जाना। विघात भीतरी विनाश है, जैसे ज्ञान, अर्थ, शक्ति या धर्म का क्षय होना। कामन्दक इन दोनों को अलग रखते हैं।
साथ ही वे मद, मान और वैषयिकी पीड़ा को भी कारण मानते हैं। मद शक्ति का नशा है, मान सम्मान का अहंकार। वैषयिकी पीड़ा इन्द्रिय-विषयों में आसक्ति से उपजी पीड़ा है। मनुस्मृति भी राजा को मद और मान के त्याग की सलाह देती है।
आधुनिक सन्दर्भ में देखें तो संसाधन-सम्पन्न क्षेत्रों में संघर्ष का बार-बार होना Resource Curse Theory की ओर संकेत करता है। कश्मीर, दक्षिण चीन सागर, नील नदी का जल-विवाद, ये सब 'स्थान-अपहार' और 'देश-अपहार' की श्रेणी में आते हैं। चीन-अमेरिका व्यापार-युद्ध का एक बड़ा हिस्सा बौद्धिक सम्पदा की चोरी की शिकायतों से बना है, जिसे कामन्दक 'ज्ञान-अपहार' कहते।
पाँचवाँ श्लोक तीन और कारण जोड़ता है।
भूतानुग्रहविच्छेदस्तथा मण्डलदूषणम्।
एकार्थाभिनिवेशित्वमिति विग्रहयोनयः॥ ५॥
भूतानुग्रह का विच्छेद अर्थात् प्राणियों, प्रजा और प्रकृति के प्रति जो सहयोग की भावना होनी चाहिए, उसका टूट जाना। मण्डल का दूषित हो जाना अर्थात् मित्रों का शत्रु बन जाना। और एकार्थाभिनिवेश अर्थात् एक ही लक्ष्य पर इतना केन्द्रित हो जाना कि बाकी सब उपेक्षित रह जाए।
यह तीसरा कारण आधुनिक नीति-निर्माण में बार-बार दिखता है। जब कोई राष्ट्र केवल आर्थिक विकास पर ध्यान देता है और पर्यावरण, सामाजिक न्याय तथा स्वास्थ्य की उपेक्षा करता है, तो कुछ वर्षों बाद सामाजिक संघर्ष उभरता है। यही 'एकार्थाभिनिवेश' का फल है। जैन दर्शन का अनेकान्तवाद इसके विपरीत खड़ा है, जो कहता है कि सत्य के अनेक पक्ष होते हैं और एक पक्ष पर अड़े रहना दृष्टि को संकुचित करता है।
इन पाँच श्लोकों को एक साथ पढ़ें तो कामन्दक का विग्रह-विश्लेषण तीन स्तरों पर चलता दिखता है। पहला स्तर मनोवैज्ञानिक है, जहाँ अमर्ष और मन्यु विग्रह को जन्म देते हैं। दूसरा स्तर भौतिक है, जहाँ राज्य, स्त्री, स्थान, देश, ज्ञान, बल और धन का हरण या क्षय विग्रह का कारण बनता है। तीसरा स्तर नैतिक और सामाजिक है, जहाँ भूतानुग्रह का टूटना, मण्डल का दूषित होना और एक ही लक्ष्य पर अड़ जाना विग्रह की जड़ बनता है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी मण्डल को राजनीति का केन्द्रीय सिद्धान्त माना गया है। परन्तु कामन्दक उसे भूतानुग्रह के साथ जोड़कर एक व्यापक नैतिक ढाँचा बनाते हैं, जिसमें प्रकृति और प्रजा दोनों की रक्षा राजा का कर्तव्य है। यह जोड़ कामन्दक की मौलिकता है।
विग्रह को शांत कैसे किया जाए? (श्लोक ६-१५)
विग्रह के कारण जान लेने के बाद कामन्दक शमन के उपायों की ओर मुड़ते हैं। यहाँ वे दो सीधे साधन बताते हैं, दान और दम।
राज्यस्त्रीस्थानदेशानां दानेन च दमेन च।
विग्रहस्य तु युक्तिज्ञैरिति प्रशमनं स्मृतम्॥ ६॥
दान का अर्थ है उपहार, धन, भूमि या सुविधाएँ देकर शत्रु की आक्रामकता कम करना। दम का अर्थ यहाँ संयम और आत्म-नियंत्रण है, अपनी प्रतिक्रिया को वश में रखना।
यह 'दम' चतुरुपाय के 'दण्ड' से भिन्न है। चतुरुपाय में साम, दान, भेद और दण्ड आते हैं, जहाँ दण्ड का अर्थ युद्ध या शारीरिक दमन है। परन्तु इस श्लोक में दम का अर्थ आन्तरिक संयम है, अपनी इच्छाओं और क्रोध को रोकना। कौटिल्य के अनुसार इन्द्रिय-जय ही सबसे बड़ा विजय है।
गीता में सात्त्विक दान की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि वह दान जो देश, काल और पात्र देखकर, बिना प्रतिकार की अपेक्षा से दिया जाए, सात्त्विक होता है (गीता १७.२०)। मार्शल प्लान (1948) को इसी परम्परा में रखा जा सकता है, जहाँ अमेरिका ने यूरोप को आर्थिक सहायता देकर सोवियत प्रभाव को रोका।
सातवाँ श्लोक प्रतिपीडन की बात करता है।
एतदेव तु विज्ञेयं स्वार्थधर्मविघातजे।
विषयध्वंसजे शत्रोर्विषयप्रतिपीडनम्॥ ७॥
जब शत्रु राज्य के विषयों का विनाश करे, तो उसके विषयों का प्रतिपीडन करना उचित है। यहाँ 'प्रतिपीडन' को केवल बदला न समझें। यह रक्षात्मक प्रतिकार है, जिसका उद्देश्य शत्रु को यह दिखाना है कि आक्रामकता का परिणाम भुगतना पड़ेगा।
मनुस्मृति दण्ड को धर्म, अर्थ और काम का रक्षक मानती है (मनुस्मृति ७.१८)। 2016 का सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 का बालाकोट स्ट्राइक इसी परम्परा में समझे जा सकते हैं। परन्तु यह ध्यान देना चाहिए कि कामन्दक प्रतिपीडन को हर स्थिति में नहीं, केवल 'विषयध्वंस' की स्थिति में उचित मानते हैं। जहाँ प्रतिपीडन से और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है, वहाँ वे दूसरे उपाय सुझाते हैं।
आठवाँ श्लोक उन्हीं वैकल्पिक उपायों की ओर ले जाता है।
ज्ञानापहारसम्भूते ज्ञानशक्तिविघातजे।
शमस्तदर्थत्यागेन क्षान्त्या वोपेक्षणेन वा॥ ८॥
ज्ञान के अपहार या ज्ञान-शक्ति के विघात से उपजे विग्रह के तीन उपाय हैं। पहला, उस अर्थ का त्याग कर देना। दूसरा, क्षमा कर देना। तीसरा, उपेक्षा कर देना। यहाँ उपेक्षा का अर्थ अवहेलना नहीं, बल्कि उदासीनता है, वह समत्व जिसे गीता योग कहती है (गीता २.४८)।
बौद्ध परम्परा में क्षान्ति को पारमिता कहा गया है। भारतीय नीति में क्षमा को वीर का आभूषण माना गया है। आधुनिक सन्दर्भ में चीन-अमेरिका व्यापार-युद्ध में जब अमेरिका ने चीन पर ज्ञान-अपहार के आरोप लगाए, तो चीन ने पहले क्षान्ति और उपेक्षा का रास्ता चुना, बाद में प्रतिकार का। यह क्रम कामन्दक के सुझाव से मेल खाता है।
नौवाँ श्लोक मित्रधर्म पर है।
अधर्मद्रोहसंयुक्ते मित्रजातेऽप्युपेक्षणम्।
आत्मवन्मित्रजाते तु प्राणानपि परित्यजेत्॥ ९॥
यदि मित्र अधर्म और द्रोह से युक्त हो, तो उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। यदि मित्र आत्मवत् हो, अपने समान विश्वसनीय हो, तो उसके लिए प्राणों तक का त्याग करना चाहिए। यहाँ मित्रजाति का अर्थ केवल व्यक्ति नहीं, सहयोगी देश और सहयोगी संस्थाएँ भी हैं।
रामायण में राम और सुग्रीव की मित्रता, महाभारत में कृष्ण और अर्जुन की मित्रता इसका आदर्श है। अरस्तू ने मित्रता के तीन प्रकार बताए थे, जिनमें गुण-मित्रता सबसे ऊँची है। कामन्दक का 'आत्मवत् मित्र' उसी श्रेणी में आता है। भारत-भूटान और भारत-रूस के सम्बन्ध इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं, जहाँ दशकों से विश्वास बना हुआ है।
दसवाँ श्लोक अपमानजनित विग्रह की बात करता है।
अपमानात्तु सम्भूतं मानेन प्रशमं नयेत्।
सामपूर्व उपायो वा प्रणामो वाभिमानजे॥ १०॥
अपमान से उपजे विग्रह को सम्मान देकर शांत करना चाहिए। अभिमान से उपजे विग्रह को साम या प्रणाम से। यहाँ प्रणाम केवल शारीरिक नमस्कार नहीं, अपने अहंकार का त्याग है।
गीता ज्ञान के लक्षणों में अमानित्व और अदम्भित्व को गिनाती है (गीता १३.७)। जैन परम्परा में विनय को धर्म का मूल कहा गया है। 1972 का शिमला समझौता इसी भावना का उदाहरण है, जहाँ दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को सम्मान देकर तनाव कम किया।
ग्यारहवाँ श्लोक बन्धु-नाशजनित विग्रह के लिए गुप्त उपाय सुझाता है।
रहस्येन प्रयोगेण रहस्यकरणेन वा।
विग्रहं शमयेद्धीरो बन्धुनाशसमुद्भवम्॥ ११॥
बन्धु-नाश से उपजे विग्रह का बदला खुले में लेना और भी विनाशकारी हो सकता है, इसलिए कामन्दक गुप्त उपायों की सलाह देते हैं। रहस्य-प्रयोग का अर्थ है गुप्तचरों, दूतों या मध्यस्थों के माध्यम से शमन। रहस्य-करण का अर्थ है गुप्त कार्य, जो शत्रु को पता न चले।
कौटिल्य ने गुप्तचर-विधान को अर्थशास्त्र का महत्त्वपूर्ण अंग बनाया और कहा कि गूढपुरुष राजा के आँख और कान होते हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच समय-समय पर चली backchannel वार्ता इसी परम्परा में समझी जा सकती है।
बारहवाँ श्लोक एकार्थाभिनिवेशजनित विग्रह का उपाय बताता है।
येन पीडा न जायेत तादृशं तु विचक्षणः।
कुर्यादर्थपरित्यागमेकार्थाभिनिवेशजे॥ १२॥
यदि एक ही लक्ष्य पर अत्यधिक अड़े रहने से विग्रह उपजा हो, तो बुद्धिमान राजा उस अर्थ का त्याग कर दे, बशर्ते त्याग से पीड़ा न हो। यहाँ अर्थ का अर्थ केवल धन नहीं, लक्ष्य और उद्देश्य भी है।
भारतीय परम्परा में त्याग को यज्ञ का मूल कहा गया है। गीता में फल-त्याग का सिद्धान्त है (गीता २.४७)। बौद्ध और जैन दोनों परम्पराएँ अपरिग्रह पर बल देती हैं।
तेरहवाँ श्लोक धन-अपहारजनित विग्रह में विरोध से बचने की सलाह देता है।
धनापहारजे जातु विरोधं न समाचरेत्।
कदाचिद्विग्रहे पुंसां सर्वनाशोऽपि जायते॥ १३॥
धन के अपहार पर विरोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि विग्रह में सर्वनाश की सम्भावना रहती है। यहाँ धन केवल मुद्रा नहीं, राज्य-कोश और संसाधन भी है।
कौटिल्य धन को राज्य का प्राण कहते हैं, परन्तु धन-अपहार पर युद्ध को अन्तिम उपाय मानते हैं। भारत-चीन के बीच व्यापार-घाटे का मुद्दा इसी श्रेणी में आता है, जहाँ भारत ने युद्ध नहीं चुना, बल्कि वार्ता को प्राथमिकता दी।
चौदहवाँ श्लोक महाजन-समुत्पन्न विग्रह के लिए भेद-नीति सुझाता है।
दृष्टोपन्यासयुक्तेन सम्प्रदानादिकेन च।
महाजनसमुत्पन्नं भेदेन प्रशमं नयेत्॥ १४॥
जब बड़े लोगों या प्रभावशाली देशों से विग्रह उपजे, तो उन्हें दृष्ट, उपन्यास, सम्प्रदान और भेद से शमन करना चाहिए। कौटिल्य ने भेद को चतुरुपाय में तीसरा स्थान दिया।
यहाँ यह ध्यान देना चाहिए कि 'Divide and Rule' को मैकियावेली का नारा मानना सामान्य भ्रान्ति है। यह नीति उससे बहुत पहले भारतीय परम्परा में मिलती है। कामन्दक इसे महाजन-विग्रह के सन्दर्भ में सीमित रूप से सुझाते हैं, हर स्थिति में नहीं।
पंद्रहवाँ श्लोक भूतानुग्रह-विच्छेद और दैवोत्थ विग्रह की बात करता है।
भूतानुग्रहविच्छेदजातस्यान्तं व्रजेद्वशी।
दैवमेव तु दैवोत्थे शमनं साधुसम्मतम्॥ १५॥
भूतानुग्रह के टूटने से उपजे विग्रह का अन्त करना चाहिए। दैव से उपजे विग्रह में दैव को ही शमन का साधन मानना चाहिए। यहाँ 'वशी' शब्द महत्त्वपूर्ण है। केवल संयमी व्यक्ति ही विग्रह का अन्त कर सकता है।
दैव से उत्पन्न होने के कारण इसे दैवोत्थ कहते हैं—भाग्य या प्राकृतिक आपदा से उपजा विग्रह। कोविड-19 महामारी में देशों ने विज्ञान और चिकित्सा का सहारा लिया, जिसे कामन्दक की भाषा में दैव-शमन कहा जा सकता है।
इस प्रकार श्लोक ६ से १५ तक कामन्दक विग्रह-शमन के अनेक उपाय गिनाते हैं। दान, दम, प्रतिपीडन, त्याग, क्षान्ति, उपेक्षा, मान, साम, प्रणाम, रहस्य, भेद और दैव-स्वीकृति। इनमें से कौन-सा उपाय कब प्रयोग करना है, यह विग्रह के कारण पर निर्भर करता है। ज्ञान-अपहार के लिए क्षान्ति, धन-अपहार के लिए त्याग, अपमान के लिए मान, अभिमान के लिए प्रणाम, बन्धु-नाश के लिए रहस्य, महाजन के लिए भेद और दैवोत्थ के लिए दैव-स्वीकृति। यह सूक्ष्म वर्गीकरण कामन्दक की मौलिकता है, जो कौटिल्य के चतुरुपाय से आगे जाता है।
वैर के प्रकार और फल-विचार क्या हैं? (श्लोक १६-२४)
विग्रह-शमन के उपायों के बाद कामन्दक वैर के वर्गीकरण और फल-विचार की ओर बढ़ते हैं। सोलहवाँ श्लोक पाँच प्रकार के वैर गिनाता है।
मण्डलक्षोभसम्भूतमुपायैः प्रशमं नयेत्।
सापत्नं वास्तुजं स्त्रीजं वाग्जातमपराधजम्॥ १६॥
सापत्न अर्थात् शत्रु-सम्बन्धी वैर, जब शत्रु स्वयं वैर का कारण हो। वास्तुज अर्थात् भूमि-सम्बन्धी वैर। स्त्रीज अर्थात् स्त्री-सम्बन्धी वैर। वाग्जात अर्थात् वाणी-सम्बन्धी वैर, अपशब्द या अपमान से उपजा। अपराधज अर्थात् किए गए अपराध का बदला।
इसके साथ ही कामन्दक कहते हैं कि मण्डल-क्षोभ से उत्पन्न विग्रह को उपायों से शमन करना चाहिए। आधुनिक सन्दर्भ में ये पाँच प्रकार इस प्रकार दिखते हैं। भारत-पाकिस्तान का शत्रु-सम्बन्ध सापत्न वैर है। कश्मीर, अक्साई चिन और दक्षिण चीन सागर के विवाद वास्तुज वैर हैं। आधुनिक युग में स्त्रीज वैर का अर्थ सम्मान-वैर हो सकता है, जब किसी देश की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हो। राजनयिक अपशब्द और मीडिया-युद्ध वाग्जात वैर हैं। आतंकवाद और साइबर-हमला अपराधज वैर हैं।
सत्रहवाँ श्लोक इस वर्गीकरण को पुष्ट करता है और भूमि-उपरोध तथा शक्ति-विघात से उत्पन्न वैर का उल्लेख करता है।
वैरप्रभेदनिपुणैर्वैरं पञ्चविधं स्मृतम्।
जातं भूम्युपरोधेन तथा शक्तिविघातजम्॥ १७॥
भूमि-उपरोध का अर्थ है भूमि पर अवरोध, सीमा-अतिक्रमण या व्यापार-अवरोध। शक्ति-विघात का अर्थ है सैन्य-क्षय। जब कोई देश युद्ध में अपनी सेना खोता है, तो वह बदले की भावना से ग्रस्त हो जाता है। 1962 के बाद भारत-चीन सम्बन्धों में यही शक्ति-विघातज वैर देखा जा सकता है।
अठारहवाँ श्लोक बाहुदन्ति के मत का उल्लेख करता है।
भूम्यनन्तरजातं च मण्डलक्षोभजं तथा।
चतुर्विधं वैरजातं बाहुदन्तिसुतोऽब्रवीत्॥ १८॥
बाहुदन्ति के अनुसार वैर चार प्रकार का है—भूम्यनन्तरज, मण्डलक्षोभज, कुलापराधज और बन्धुनाशज। यहाँ कामन्दक यह स्वीकार करते हैं कि वैर के वर्गीकरण की कोई एकमात्र सार्वभौमिक पद्धति नहीं है। अन्य आचार्यों की अपनी श्रेणियाँ हो सकती हैं।
यह ज्ञान-मीमांसा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। सत्य एक है, परन्तु उसके ज्ञान के अनेक आयाम हो सकते हैं। अर्थशास्त्र-परम्परा में बाहुदन्ति को एक पूर्ववर्ती आचार्य माना जाता है, परन्तु उनकी निर्विवाद पहचान अभी तक तय नहीं है।
उन्नीसवाँ श्लोक कुलापराधज वैर के फल की बात करता है।
कुलापराधजे प्राहुर्वैरे द्वे एव मानवाः।
किञ्चित्फलं निष्फलं च सन्दिग्धफलमेव च॥ १९॥
यहाँ 'द्वे एव' और आगे तीन फलों का उल्लेख है। इस विरोध को लेकर टीकाकारों में मतभेद है। प्रमुख टीका का कहना है कि 'द्वे' का सम्बन्ध वैर के दो भेदों से है, जबकि फल आगे अलग से गिनाए गए हैं—यानी वैर के दो भेद, और फलों की तीन श्रेणियाँ।
फल तीन हैं। किञ्चित अर्थात् कुछ फल, निष्फल अर्थात् कोई फल नहीं, और सन्दिग्ध अर्थात् अनिश्चित फल। यह वर्गीकरण बताता है कि हर विग्रह का परिणाम एक जैसा नहीं होता। कुछ विग्रह अल्प लाभ देते हैं, कुछ कुछ भी नहीं देते, और कुछ का परिणाम पहले से तय नहीं किया जा सकता। बुद्धिमान राजा वही विग्रह करे जिसका फल निश्चित हो।
बीसवाँ श्लोक विग्रह के फल-विचार की विधि बताता है।
तदात्वे दोषजननमायत्यां चापि निष्फलम्।
आयत्यां च तदात्वे च दोषस्य जननं तथा॥ २०॥
कुछ विग्रह वर्तमान में दोष उत्पन्न करते हैं और भविष्य में निष्फल होते हैं। कुछ विग्रह भविष्य और वर्तमान दोनों में दोष उत्पन्न करते हैं। कार्य का मूल्यांकन वर्तमान और भविष्य दोनों कालों में करना चाहिए।
1962 में चीन ने अल्पकालिक लाभ लिया, परन्तु दीर्घकालिक नुकसान उठाया। विश्वास-संकट आज भी बना हुआ है।
इक्कीसवाँ श्लोक विग्रह के कुछ और कारण बताता है।
अपरिज्ञातवीर्येण परेण स्तोभितोऽपि वा।
परार्थं स्त्रीनिमित्तं च दीर्घकालं द्विजोत्तमैः॥ २१॥
कभी-कभी राजा को ऐसे शत्रु द्वारा उकसाया जाता है जिसका वास्तविक पराक्रम ज्ञात नहीं होता। कभी विग्रह परार्थ, स्त्री-निमित्त या दीर्घकाल तक खिंचता चला जाता है। ऐसे में विद्वान राजा को चाहिए कि वह जल्दबाज़ी न करे।
शत्रु कभी-कभी सीधे आक्रमण नहीं करता, बल्कि दूसरों को उकसाकर विग्रह करवाता है। आधुनिक युग में इसे proxy war कहा जाता है। अमेरिका-रूस के बीच यूक्रेन युद्ध इसका उदाहरण है।
बाईसवाँ श्लोक अकाल-विग्रह के फल का वर्णन करता है।
अकाले दैवयुक्तेन बलोद्धृतसखेन च।
तदात्वे फलसंयुक्तमायत्यां फलवर्जितम्॥ २२॥
असमय में, दैव-युक्त और बल-उद्धृत-सख वाले शत्रु के साथ किया गया विग्रह वर्तमान में फल देता है, भविष्य में नहीं। अकाल में किया गया विग्रह अल्पकालिक लाभ देता है, दीर्घकालिक नहीं।
तेईसवाँ श्लोक षोडशविध विग्रह का निषेध करता है।
आयत्यां फलसंयुक्तं तदात्वे निष्फलं तथा।
इतीमं षोडशविधं न कुर्यादेव विग्रहम्॥ २३॥
'षोडशविध' शब्द पर टीकाएँ एकमत नहीं हैं। कुछ टीकाकार इसे विग्रह के सोलह प्रकारों से जोड़ते हैं, कुछ इसे वर्तमान और भविष्य के फल-संयोजनों से। टीकाओं के अनुसार यहाँ संकेत उन सोलह स्थितियों की ओर है जो तदात्व (वर्तमान) और आयति (भविष्य) के फलों के मेल से बनती हैं। इनमें वह स्थिति भी आती है जिसमें विग्रह भविष्य में फल देता है पर वर्तमान में निष्फल रहता है। कामन्दक ऐसे विग्रह को निषिद्ध मानते हैं।
चौबीसवाँ श्लोक द्विकाल-शुद्धि का निर्देश देता है।
तदात्वायतिसंशुद्धमारभेत विचक्षणः।
तदात्वायतिशुद्धानि सर्वकर्माणि चिन्तयेत्॥ २४॥
बुद्धिमान वही कार्य आरम्भ करे जो वर्तमान और भविष्य दोनों में शुद्ध और लाभकारी हो। सतत विकास इसी सोच पर आधारित है, जो वर्तमान और भविष्य दोनों की रक्षा करता है।
विग्रह कब करना चाहिए? (श्लोक २५-३२)
पच्चीसवाँ श्लोक साधु-कर्म की महिमा बताता है।
तदात्वायतिसंशुद्धमातिष्ठन्नैति वाच्यताम्।
साधु लोकद्वयग्राहि विद्वान्कर्म समाचरेत्।
परित्यजेदिमं लोकं नार्थलेशोपलोभितः॥ २५॥
वर्तमान और भविष्य में शुद्ध कार्य करने वाला निन्दा को प्राप्त नहीं होता। विद्वान दोनों लोकों को ग्रहण करने वाला साधु कर्म करे। अर्थ-लेश के लोभ से इस लोक का त्याग न करे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चतुर्वर्ग में धर्म सर्वोपरि है।
गीता में लोकसंग्रह का सिद्धान्त है (गीता ३.२०)। आधुनिक युग में नैतिक शासन और सतत विकास इसी सोच का रूप है।
छब्बीसवाँ श्लोक आगम-प्रमाण के आधार पर साधु-कर्म का निर्देश देता है।
परलोकविरुद्धानि कुर्वाणं दूरतस्त्यजेत्।
इत्यागमप्रमाणत्वात्साधु कल्याणमाचरेत्॥ २६॥
परलोक के विरुद्ध कार्य करने वाले को दूर से त्याग देना चाहिए। आगम के प्रमाण से साधु कल्याण का आचरण करना चाहिए। श्रुति, स्मृति और आगम तीनों को प्रमाण माना गया है। मीमांसा दर्शन में शब्द-प्रमाण को सर्वोच्च प्रमाण माना गया है। आधुनिक युग में संविधान और कानून इसी श्रेणी में आते हैं।
सत्ताईसवाँ श्लोक शक्ति-संतुलन की बात करता है।
यदा मन्येत मतिमान्हृष्टं पुष्टं स्वकं बलम्।
परस्य विपरीतं च तदा विग्रहमाचरेत्॥ २७॥
कामन्दक यहाँ युद्ध को शक्ति-तुलना की शर्त से बाँधते हैं। जब तक अपना बल शत्रु से अधिक न दिखे, तब तक विग्रह का निर्णय नहीं लेना चाहिए। कौटिल्य ने भी शक्ति-संतुलन को राजनीति का केन्द्रीय सिद्धान्त माना था। आधुनिक युग में अमेरिका-चीन-रूस का त्रिकोणीय संतुलन इसका उदाहरण है।
अट्ठाईसवाँ श्लोक प्रकृति-मण्डल के आधार पर विग्रह का नियम बताता है।
स्फीतं यदानुरक्तं च भवेत्प्रकृतिमण्डलम्।
परस्य विपरीतं च तदा विग्रहमाचरेत्॥ २८॥
जब अपना प्रकृति-मण्डल स्फीत और अनुरक्त हो, तथा शत्रु का विपरीत हो, तभी विग्रह करे। यहाँ कामन्दक मण्डल-सिद्धान्त को ही विग्रह की शर्त बना देते हैं। राजा के मित्रों और सहयोगियों की स्थिति विग्रह का निर्धारण करती है।
उनतीसवाँ श्लोक दैव के आधार पर विग्रह का नियम बताता है।
उपनामि यदा दैवं सुव्यक्तमुपलक्षितम्।
परस्य विपरीतं तु तदा विग्रहमाचरेत्॥ २९॥
जब दैव समीप आया हुआ और सुव्यक्त रूप से उपलक्षित हो, तथा शत्रु का विपरीत हो, तभी विग्रह करे। यहाँ 'उपनामि' शब्द का अर्थ टीकाओं में 'समीप आने वाला' या 'उपस्थित' लिया गया है। विग्रह से पहले भाग्य और प्राकृतिक परिस्थितियों का विचार करना चाहिए।
तीसवाँ श्लोक मित्र-बल के आधार पर विग्रह का नियम बताता है।
मित्रमाक्रन्द आसारो यदा स्युर्दृढभक्तयः।
परस्य विपरीताश्च तदा विग्रहमाचरेत्॥ ३०॥
जब मित्र, आक्रन्द और आसार दृढभक्त हों, तथा शत्रु के विपरीत हों, तभी विग्रह करे। नाटो, क्वाड और ब्रिक्स जैसे गठबन्धन इसी श्रेणी में आते हैं।
इकतीसवाँ श्लोक विग्रह के तीन फल बताता है।
भूमिर्मित्रं हिरण्यं च विग्रहस्य फलं त्रयम्।
यदैतन्नियतं भावि तदा विग्रहमाचरेत्॥ ३१॥
भूमि, मित्र और हिरण्य, ये तीन विग्रह के फल हैं। जब ये तीनों निश्चित हों, तभी विग्रह करे। कौटिल्य ने भूमि को राज्य का प्रमुख अंग माना था।
बत्तीसवाँ श्लोक भूमि की सर्वोच्चता को दर्शाता है।
गुरु वित्तं ततो मित्रं तस्माद्भूमिर्गरीयसी।
भूमेर्विभूतयः सर्वास्ताभ्यो बन्धुसुहृद्गणाः॥ ३२॥
वित्त से मित्र गुरु, मित्र से भूमि गरीयसी। भूमि से सभी विभूतियाँ, और उनसे बन्धु-सुहृद्-गण प्राप्त होते हैं। आधुनिक भू-राजनीति में Heartland Theory और Rimland Theory इसी परम्परा के विकास हैं। कश्मीर, अक्साई चिन और दक्षिण चीन सागर के विवाद इसी श्रेणी में आते हैं।
युद्धनीति और व्यवहार-कुशलता क्या है? (श्लोक ३३-४१)
तैंतीसवाँ श्लोक उपाय और दण्ड के क्रम का विवेचन करता है।
सर्वसम्पत्समे शत्रावुपायान्निक्षिपेद्बुधः।
उपायैरप्रतिव्यूढे समे दण्डः प्रशस्यते॥ ३३॥
जब शत्रु सर्वसम्पत्ति में समान हो, तो बुद्धिमान राजा को सर्वप्रथम उपायों का प्रयोग करना चाहिए। यदि शत्रु इन उपायों से अविचलित रहे, तभी दण्ड की प्रशंसा की जाती है। चतुरुपाय में साम, दान, भेद, दण्ड का क्रम है।
कौटिल्य ने इस क्रम को विस्तार से समझाया। आधुनिक कूटनीति में Diplomacy First, Military as Last Resort इसी सोच का रूप है। संयुक्त राष्ट्र के शांति-स्थापना मिशन इसी क्रम पर आधारित हैं।
चौंतीसवाँ श्लोक विग्रह-शमन की नीति बताता है।
आगतं विग्रहं विद्वानुपायैः प्रशमं नयेत्।
विजयस्य ह्यनित्यत्वाद्रभसेन न सम्पतेत्॥ ३४॥
विद्वान आए हुए विग्रह को उपायों से शमन करे। विजय की अनित्यता के कारण वेग से निर्णय न करे। विजय स्थायी नहीं होती। बौद्ध दर्शन में अनित्यता का सिद्धान्त है। गीता में स्थितधी का लक्षण बताया गया है (गीता २.५६)।
अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में सैन्य विजय पाई, परन्तु स्थायी शांति नहीं मिली।
पैंतीसवाँ श्लोक वैतसी और भुजंगी वृत्ति का वर्णन करता है।
समाक्रान्तो बलवता काङ्क्षन्नभ्रंशिनीं श्रियम्।
श्रयेत वैतसीं वृत्तिं न भौजङ्गीं कदाचन॥ ३५॥
बलवान शत्रु से आक्रान्त होकर अक्षय श्री चाहने वाला व्यक्ति वैतसी वृत्ति अपनाए, भुजंगी वृत्ति कभी नहीं। वैतसी शब्द 'वेतस' से बना है, जिसका अर्थ है बेंत। वैतसी वृत्ति का अर्थ है परिस्थिति के दबाव में लचीलापन। बेंत तूफान में झुकता है, परन्तु टूटता नहीं। भुजंग यानी सर्प की कुटिलता अन्ततः आत्मघात है।
लाओत्से ने कहा है कि जल की तरह बनो, जो नम्र है पर चट्टान को भी काट देता है। भारत की Strategic Autonomy नीति इसी भावना से प्रेरित है।
छत्तीसवाँ श्लोक वैतसी और भुजंगी वृत्ति के फल बताता है।
क्रमाद्वेतसवृत्तिः सन्प्राप्नोति महतीं श्रियम्।
भुजङ्गवृत्तिराप्नोति वधमेव तु केवलम्॥ ३६॥
क्रम से वेतस-वृत्ति वाला महती श्री प्राप्त करता है; भुजंग-वृत्ति वाला केवल वध प्राप्त करता है। चीन ने 1978 के बाद क्रमशः आर्थिक विकास किया और आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।
सैंतीसवाँ श्लोक सिंह-वृत्ति का वर्णन करता है।
मत्तप्रमत्तवत्स्थित्वा ग्रसेतोत्प्लुत्य पण्डितः।
अपरिभ्रश्यमानं हि क्रमप्राप्तं मृगेन्द्रवत्॥ ३७॥
मत्त और प्रमत्त के समान स्थित होकर, उछलकर शत्रु का ग्रसन करे। अपरिभ्रष्ट क्रम-प्राप्त को सिंह के समान ग्रहण करे। जब अवसर आए, तो सिंह की तरह झपटो।
कौटिल्य ने भी 'सिंहवत् प्रक्रमेत्' कहा है—अर्थात् सिंह की तरह अवसर देखकर आगे बढ़ो। अमेज़न ने ई-कॉमर्स में अवसर देखकर तुरन्त कदम उठाया और बाजार पर राज किया।
अड़तीसवाँ श्लोक कूर्म-वृत्ति और सर्प-वृत्ति का वर्णन करता है।
कौर्मं सङ्कोचमास्थाय प्रहारमपि मर्षयेत्।
काले प्राप्ते तु मतिमानुत्तिष्ठेत्क्रूरसर्पवत्॥ ३८॥
कछुए की तरह संकोच कर प्रहार सहन करे। समय आने पर बुद्धिमान क्रूर सर्प की तरह उठे। कछुए की तरह संकोच करना कायरता नहीं, रणनीति है। कामन्दक धैर्य को शक्ति से अलग नहीं मानते—जो सहता है, वही अन्ततः उठता भी है। भारत ने 1962 के बाद यही रास्ता लिया।
उनतालीसवाँ श्लोक समय-अनुकूल व्यवहार की शिक्षा देता है।
काले सहिष्णुर्गिरिवदसहिष्णुश्च वह्निवत्।
स्कन्धेनापि वहेत्काले प्रियाणि समुदाहरन्।
सम्प्राप्ते चैव काले तु भिन्द्याद्घटमिवाश्मनि॥ ३९॥
समय पर पर्वत की तरह सहिष्णु, और समय पर अग्नि की तरह असहिष्णु होना चाहिए। समय पर कंधे पर भी सहन करे और प्रिय वचन बोले। उचित समय आने पर पत्थर पर घड़े की तरह शत्रु को भेद दे। सम्भवतः यह दो श्लोकों का संयुक्त पाठ है, परन्तु भाव एक ही है—समय के अनुसार व्यवहार बदलना।
चालीसवाँ श्लोक स्वार्थ-सिद्धि की नीति बताता है।
नित्यं स्वार्थपरो लोकः स्वार्थसिद्धिर्यथा भवेत्।
तथा तस्य प्रतीकारं यथोक्तं समुपाचरेत्॥ ४०॥
नित्य स्वार्थपर लोक है। स्वार्थ की सिद्धि के लिए यथोक्त प्रतीकार का समुपाचरण करे। यह अत्यन्त यथार्थवादी कथन है। मैकियावेली ने भी कहा है कि राजा को स्वार्थ को प्रधानता देनी चाहिए। आधुनिक युग में राष्ट्रीय हित की सिद्धि इसी सोच का रूप है।
इकतालीसवाँ श्लोक श्री-प्राप्ति की नीति बताता है।
प्रसादवृत्त्याहितलोकवृत्त्या प्रविश्य शत्रोर्हृदयं निरन्तरम्।
नयाग्रहस्तेन हि कालमास्थितः प्रसह्य कुर्वीत कचग्रहं श्रियः॥ ४१॥
प्रसाद-वृत्ति और आहित-लोक-वृत्ति से शत्रु के हृदय में निरन्तर प्रवेश कर, नीति के अग्र-हस्त से काल की प्रतीक्षा कर, समय आने पर श्री का बलपूर्वक कचग्रह करना चाहिए। कचग्रह का अर्थ है बालों को पकड़ना, अर्थात् पूर्ण अधिकार करना।
शत्रु के गुण-दोष क्या हैं? (श्लोक ४२-४३)
बयालीसवाँ श्लोक शत्रु के सद्गुण बताता है।
कुलोद्गतं सम्यगुदारविक्रमं स्थिरं कृतज्ञं मतिमन्तमूर्जितम्।
अतीव दातारमुपेतवत्सलं सुदुष्प्रसाधं प्रवदन्ति विद्विषम्॥ ४२॥
कुलीन, उदार विक्रम वाला, स्थिर, कृतज्ञ, बुद्धिमान, ऊर्जस्वी, अत्यन्त दानी और वत्सल शत्रु दुर्जय होता है। ऐसे शत्रु से युद्ध नहीं, संधि करनी चाहिए। कौटिल्य ने भी राज-गुण को प्रकृति-सम्पन्न कहा और ऐसे शत्रु से संधि की सलाह दी।
ऐसे सद्गुणी प्रतिद्वंद्वी को हराना कठिन होता है। कॉर्पोरेट जगत में टोयोटा और एप्पल जैसे प्रतिस्पर्धी इसी श्रेणी में आते हैं।
तैंतालीसवाँ श्लोक शत्रु के दुर्गुण बताता है।
असत्यता निष्ठुरताकृतज्ञता भयं प्रमादोऽलसता विषादिता।
वृथाभिमानोऽपि च दीर्घसूत्रता तथाङ्गनाक्षादि विनाशनं श्रियः॥ ४३॥
असत्यता, निष्ठुरता, कृतघ्नता, भय, प्रमाद, आलस्य, विषाद, वृथाभिमान, दीर्घसूत्रता, स्त्री और अक्ष-क्रीड़ा, ये श्री का विनाश करने वाले दोष हैं। ऐसे शत्रु को युद्ध में हराना सरल है।
भ्रष्ट, अकुशल और अत्याचारी शासक इन दुर्गुणों के कारण नष्ट होते हैं।
निष्कर्ष (श्लोक ४४-४५)
चवालीसवाँ श्लोक विजिगीषा की नीति बताता है।
इति स्म दोषान्वितमाशु विद्विषं त्रिशक्तियुक्तो विजिगीषया व्रजेत्।
अतोऽन्यथासाधुजनस्य सम्मतः करोत्यविद्वानुपघातमात्मनः॥ ४४॥
दोषों से युक्त शत्रु को शीघ्र ही त्रिशक्ति से युक्त होकर विजिगीषा से आगे बढ़ना चाहिए। अन्यथा अविद्वान असाधु जन के सम्मत होकर अपना उपघात करता है। त्रिशक्ति का अर्थ है—प्रभु-शक्ति अर्थात् राजा का नेतृत्व, मन्त्र-शक्ति अर्थात् मन्त्रियों की बुद्धि, और उत्साह-शक्ति अर्थात् सेना तथा प्रजा का उत्साह। तीनों के संयोग से ही विजय सम्भव है।
कौटिल्य ने इन्हें शक्ति-त्रय कहा। आधुनिक युग में राजनीतिक नेतृत्व, बौद्धिक पूँजी और सैन्य शक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। जो देश तीनों में सम्पन्न हैं, वे विजयी होते हैं।
पैंतालीसवाँ श्लोक विग्रह-मार्ग का अन्तिम निर्देश देता है।
समन्वितो राज्यपदोन्निनीषया मनीषयान्वीक्षितमण्डलक्रियः।
इमं नृपो विग्रहमार्गमास्थितः स्थिरोद्यमः सम्प्रयतेत सिद्धये॥ ४५॥
राज्य-पद के उन्नयन की इच्छा से समन्वित, बुद्धि से मण्डल-क्रिया का अन्वीक्षण करता हुआ, इस विग्रह-मार्ग पर आस्थित राजा स्थिर उद्यम से सिद्धि के लिए प्रयत्न करे। सिद्धि के लिए स्थिर उद्यम आवश्यक है।
गीता में कर्मयोग का सिद्धान्त है (गीता २.४७)। भारत ने स्वतंत्रता संग्राम में स्थिर उद्यम से सफलता पाई।
कामन्दकीय नीतिसार का दशम सर्ग विग्रहविकल्पप्रकरणम् राजनीति के उस पक्ष को उजागर करता है जिसे प्रायः नैतिकता के दायरे से बाहर माना जाता है। संघर्ष, युद्ध और उसके शमन की नीति। यह सर्ग बताता है कि विग्रह केवल आवेग नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय है जो देश, काल, बल, मित्र, दैव और फल के विचार के बाद ही किया जाना चाहिए।
यह सर्ग यथार्थवाद और आदर्शवाद का सन्तुलन प्रस्तुत करता है। जहाँ विग्रह को अन्तिम उपाय माना गया है, वहीं शमन को प्राथमिकता दी गई है। वैतसी-वृत्ति और भुजंगी-वृत्ति का भेद, समय-बोध, त्रिशक्ति और भूमि-प्रधानता, ये सभी सिद्धान्त आज भी प्रासंगिक हैं।
आधुनिक अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में, कॉर्पोरेट रणनीति में और व्यक्तिगत जीवन में कामन्दक के ये सूत्र संघर्ष-प्रबंधन, समय-प्रबंधन, शक्ति-संतुलन और नैतिक-शासन के रूप में प्रकट होते हैं। अन्तिम श्लोक का सन्देश है, स्थिर उद्यमः सम्प्रयतेत सिद्धये। स्थिर उद्यम से सिद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यही कामन्दक का सार है। विवेक, धैर्य और स्थिर उद्यम, तीनों के संयोग से ही राजा सिद्धि प्राप्त करता है।
कामन्दक का विग्रह-विचार आज के नीति-निर्माता के लिए एक दर्पण है। वे विग्रह को निषेध नहीं करते, परन्तु उसे एक ऐसी प्रक्रिया में बदल देते हैं जिसमें हर कदम पर विवेक और संयम की परीक्षा होती है। इसमें अमर्ष और मन्यु को पहचानना, देश-काल-बल को तौलना, मित्र और मण्डल को परखना और फिर शमन के सभी उपायों को युद्ध से पहले आज़माना शामिल है। यह क्रम आज के युग में भी उतना ही ज़रूरी है जितना कामन्दक के समय में था। जो राष्ट्र या संस्था इस क्रम को भूल जाती है, वह अकाल-विग्रह में फँस जाती है। जो इसे अपनाती है, वह स्थिर उद्यम से सिद्धि की ओर बढ़ती है।
'आगतं विग्रहं विद्वानुपायैः प्रशमं नयेत्' - विग्रह आने पर विद्वान उसे उपायों से शांत करे, क्योंकि विजय स्थायी नहीं होती; वेग से निर्णय न लेना ही विवेक है। यही दशम सर्ग का शाश्वत सन्देश है।
कामन्दकीय नीतिसार, दशम सर्ग: विग्रह और शांति का विज्ञान — विग्रह-नीति का शास्त्रीय मार्गदर्शन। Indian Philosophy & Ethics Blog.
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